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Sunday, November 8, 2015

मिट्टी के दिये





दिवाली चली गयी,
सब फिर से,
हो गए अस्त-व्यस्त ||

लाये थे सजोकर,
कुम्भार के घर से,
कही गिर कर टूट ना जाये,
बड़े ही नाजुक है ||

उसमे भर घी और बाती,
सजाकर रख दिए,
घर-आंगन, और छत पर ||

पूरा संसार हो गया प्रकाशित,
दूर हो गए अन्धकार |
सब सो गए,
छोड़ इन्हें अकेला ||

लेकिन ये जागते ही रहे,
अविचलित, अडिग
एक सजग प्रहरी की भाती ||


और फिर सयंम रूपी घी,
साथ छोड़ गया,
बाती भी वीरगती को प्राप्त हुई ||

सुबह निचे पड़े अपनी,
खुद की तलाश में,
होकर टुकड़े, बिखर गए,
ये मिट्टी के दिए ||

मनो कह रहे हो,
मिट्टी से आये थे
मिट्टी में ही मिल गए,
ये मिट्टी के दिए ||

नोट :- सभी चित्र गूगल से लिए गए है |