समर्थक

Friday, July 10, 2015

पहली खुशी

जब माँ के नर्म
हांथो का हुआ था स्पर्श,
रोम-रोम खिल उठा मेरा,
बहूत खुश हुआ था मैं|

जब भी किसी की डाट मिली,
हमेशा मेरे सामने दीवार सी अडिग,
हमेशा दुलारा, पुचकारा मुझे,
बहूत खुश हुआ था मैं||

जब पापा का हाँथ सर पर पड़ा,
लगा जैसे मुझे हिम्मत मिल गयी,
जब उंगली पकड़कर हिम्मत से चलना सीखा,
बहूत खुश हुआ था मैं|

जब दादा दादी मेरी लगती छुपाते,
और मेरी गलतियाँ यूँ माफ कर देते,
और ऐसी मुस्कान जैसे मैने कुछ किया ही ना हो,
बहूत खुश हुआ था मैं||

पहला खिलौना जो इक सायकिल,
जो सबसे अनमोल और अनोखी थी,
वही थी मेरी पहली खुशी,
बहूत खुश हुआ था मैं|
बहूत खुश हुआ था मैं...........

कभी हँस भी लिया करो

थोड़ी गुमसुम,
उदास सी
रोनी सूरत बनाये हुये,
अरे कभी हँस भी लिया करो|

कभी बेटी,
बहन, पत्नी और माँ,
और भी ना जाने कितने रूप तेरे,
कभी खुद को भी जी लिया करो|
अरे कभी हँस भी लिया करो||

हर गली-कुचो,
रास्ते और चौराहे पर मिलती है,
कई क्रूर सी घूरती आंखे,
अरे कभी इन पर गुस्सा भी किया करो|
अरे कभी हँस भी लिया करो||

हमेशा घर हो या बाहर,
दूसरे की पहचान को जीया है,
कभी खुद को भी पहचान लिया करो|
अरे कभी हँस भी लिया करो||

किसी भी वक्त,
दिन हो या शहर,
अपना सब कुछ,
दूसरे पर न्योछावर करने को तत्पर,
कभी कुछ . भी ले लिया करो|
अरे कभी हँस भी लिया करो||

अपने अंदर गमो का तूफ़ान दबाये,
पूरे घर को खुशियों से महकाए,
कभी हमे ही अपने गमों,
का हिस्सा बनाया करो|
अरे कभी हँस भी लिया करो||

अरे कभी हँस भी लिया करो,
अरे कभी हँस भी लिया करो.............