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Wednesday, February 18, 2015

मेरे दादाजी

मै एक छोटा,
परन्तु भाग्यशाली वयस्क हूँ ।
क्योकि मेरे पास,
एक संयुक्त परिवार है ॥

इस परिवार में है सभी,
और मेरे दोस्त ।
सुख-दुःख के साथी,
मेरा सारा संसार है ॥

जब वह मुझे अपने,
हाथो से उठाते है ।
और मुझे लुभाते,
बार-बार है ॥

कभी-कभी छोटे मीठे दाने,
कभी खिलाते चोकोबार है ।
तब ऐसा लगा जैसे,
मेरे दादाजी ही मेरा पूरा संसार है ॥

मेरे नाराज होने पर,
कभी लुभाते, कभी मनाते ।
कभी मेरी हरकतों पर,
मन ही मन मुस्कुराते है ॥

मेरे दादाजी ही मेरी,
गलतियां छुपाते ।
सभी की डाट से बचाते,
मुझको बार-बार है ॥

और अन्य सभी को,
गर्व से बताते, कहते,
यही है मेरा प्रिय सूद,
यही मेरा सारा संसार है ॥

न जाने कब मेरा संसार,
मुझसे रूठ गया ।
होकर कमजोर, लाचार और बृद्ध,
बन गया काल का आहार है ॥

मेरी उँगलियाँ भले ही कितनी,
बड़ी हो जाएँ लेकिन।
हमेशा मेरी उंगलियाँ उन्हें टटोलती रहेगी,
लेकिन मेरी यह कोशिस बेकार है ॥

अब मै  हूँ,
मेरा पूरा परिवार है।
लेकिन कहा गया,
मेरा वो पूरा संसार है ॥

मेरे दादाजी ही मेरा,
संपूर्ण संसार है ।
उनके चरणो में मेरा उनको,
अन्तिम प्रणाम है ।।