बचपन

उसे बचपन न समझो वह फुल सी कली है !
जहा न हो बच्चे वह कौन सी गली है !!

कुछ की होती है गर्भ मे हत्या !
तथा कुछ करते है यौवन मे आत्महत्या !!

जब उन्हे लेनी चाहीये शिक्षा !
तब वे मागते है सङको पर भीक्षा !!

कुछ बन जाते है कच्ची उम्र मे छोटु !
लोग इन्हे समझते है मुर्ख और भोंदु !!

कुछ छोटु होटलो मे धोते है प्लेट !
तथा कुछ सोते है भुखे पेट !!

कोइ भी नही देता है उन्हे सहारा !
क्योकी दुनिया के लिये वे है बेसहारा !!

बच्चो का बचपन तुम ना गवाना !
क्योकी बचपन मिलता नही दोबारा !!

अब फुल से बच्चे बन गये है कठोर !
क्योकी उनको भोजन नही मिलता कही और !!

वे है हम लोगो की उपेक्षाओं का शिकार !
उन्हे देना चहीये समुचित प्यार और आहार !!

जिवन पर खेलकर पाता है सुखी रोटी !
उसकी दुनिया है संकृत और छोटी !!

बच्चे है बेसहारा,भुखे और नंगे !
सारी दुनिया करती है हर हर गंगे !!

इनके है चोर,झुठे और कई नाम !
इनको मिलते है मार गालियो के सम्मान !!

ये जिवन भर सहते है दर्द और मार !
कोई भी इन्हे नही करता है प्यार !!

मै करुंगा दुआ खुदा और सभी से !
इन्हे मत दो दर्द कभी भी कही से !!

सबको गले लगाओ !
पढो और पढाओ !!
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